सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

कितने कारगर पुलिस सुधार

कविता राज


पुलिस कार्यप्रणाली में सुधार की मांग कई बार उठी है...हाल ही में दिल्ली और यूपी समेत देश के कई राज्यों में पुलिस के बर्बर रवैये और गैंगरेप जैसी आपरादिक वारदातों के बाद पुलिस प्रणाली में सुधार की वकालत फिर से होने लगी है...बहस छिड़ गई है कि देश के बड़े शहरों समेत छोटे शहरों में पुलिस कार्यप्रणाली कैसी है ..उन शहरों में पुलिस की कार्यशैली कैसी है जहां पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू है..सवाल उठवने लगे हैं कि पुलिस कमीश्नर सिस्टम बेहतर है या मौजूदा समय में मजिस्टि्रियल प्रणाली ज्यादा कारगर है....
अब सवाल ये है कि क्या सभी राज्यों में पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू होना चाहिए?
hdr....कहां है पुलिस कमीश्मर सिस्टम?
मौजूदा वक्त में पूरे देश में 47 पुलिस कमीश्मर है....कोलकाता में अंग्रेज़ों के ज़माने से ही ये व्यवस्था लागू है....
दक्षिण भारत के शहरों में इसे प्रमुखता से लागू किया गया है.....हरियाणा के अंबाला और फरीदाबाद में भी पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू है....जबकि बाकी जगहों पर डीजीपी और आईजी समेत एसएसपी स्तर के अफ़सर कानून व्यवस्था संभालते हैं....यूपी और बिहार जैसे बड़े राज्यों में पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू करने की मांग लंबे अरसे से हो रही है ...लेकिन यहां के आईएएस अधिकारियों का तका इसका पुरज़ोर विरोध करता आ रहा है....2007 में बीएसपी ने इसे अपने घोषणापत्र में भी शामिल किया था लेकिन अधिकारियों के विरोध के चलते ये संभव नहीं हो पाया...
एसपी सरकार भी इस दिशा में कोई प्रयास करती नहीं दिखाई देती है ...मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां की पुलिस भी इसे अपनी पुरानी हसरत कहकर इसका समर्थन करती दिखती है..लेकिन यहां भी सरकार और नौकरशाहों के ढीले ढाले रवैये के चलते इस पर बात आगे नहीं बढ़ पाई है.....
क्यों होता है पुलिस कमीश्नर सिस्टम का विरोध ?
इस प्रणाली के अमल में आने से आईएएस अधिकारियों के अधिकार छिनने का खतरा बना रहता है...पुलिस कमीश्नर प्रणाली के तहत अधिकारियों को ज्यादा अधिकार मिल जाते हैं....जबकि मौजूदा व्यवस्था में मजिस्ट्रेट के पास सारे अधिकार होते हैं....पुलिस को अपने इलाके में शांति व्यवस्था और कानून बनाए रखने के लिए मजिस्ट्रेट के आदेश पर निर्भर रहना पड़ता है.....
क्या है पुलिस कमीश्नर सिस्टम?
पुलिस कमीश्नर सिस्टम अंगिरेज़ों के ज़माने की व्यवस्था है
जिन शहरों की आबादी 10 लाख से ज्यादा है वहां कमीश्नर की नियुक्ति की जाती है
दिल्ली में 1979 में जेएन चतुर्वेदी की पहला पुलिस कमीश्नर बनाया गया
इस प्रणाली के तहत पुलिस के पास सीआरपीसी के तहत कई अधिकार आ जाते हैं...इसी अधिकार के तहत पुलिस को भीड़ को काबू करने के लिए उस पर लाठीचार्ज..फायरिंग .धारा 144 और आर्म्स लाइसेंस जैसी कार्यवाही की छूट मिल जाती है...
किसी होटल ..बार का लाइसेंस रद्द करने का भी अधिकार पुलिस के पास आ जाता है...
आरोपी पर जुर्माना लगाकर उसे जेल भेजने ,,,,,एनएसए यानू राष्ट्रीय सुरक्षा कानून..नारकोटिक्स..एक्साइज़ संबंधी अधिकार भी पुलिस कमीश्नर के पास होते हैं.....
दूसरी ओर मजिस्ट्रिय सिस्टम में धारा 144 ...107 और 51 की पावर डीसी के पास रहती है....
Gfx out
पुलिस कमीश्नर सिस्टम को लागू करने की वकालत करने वालों का तर्क है कि ये इसके लागू होने से पुलिस नेताओं और अफ़सरों के हाथ का खिलौना नहीं रह पाएगी....जबकि दूसरी  ओर इसका विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे पुलिस निरंकुश हो जाएगी..
जानकार कहते हैं कि पुलिस बल की संख्या बढ़ाने  और काम के बोझ को कम करना मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है.....पुलिस के जवानों का वेतन बढ़ाने और उन्हें आधुनिक करने की भी ज़रूरत है
जहां तक पुलिस प्रणाली में सुधार और संशोधित एक्ट को लागू करने की बात है ...तो अब तक कई राज्यों ने इश पर अमल नहीं किया है..5 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित पुलिस एक्ट को लागू करने के आदेश भी दिए थे ....
नए एक्ट के तहत सुरक्षा आयोग का गठन करना होगा
जो पुलिस को कामकाज की निगरानी करेगा और राज्य सरकार  को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा...
आयोग की रिपोर्ट मानने के लिए सरकार बाध्य होगी और उसकी मनमर्ज़ी पर लगाम लग सकेगी..
नए एक्ट में डीजीपी की नियुक्ति वरिष्ठता और सेवा रिकॉर्ड के आधार पर होनी चाहिए...और यहीं प्रक्रिया आईजी.....डीआईजी रेंज से लिए भी लागू करने की बात कही गई थी....
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पुलिस सुधार प्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट का पहला आदेश यही था कि पुलिस के कामकाज से राजनैतिक हस्तक्षेप खत्म किया जाए....कोर्ट के आदेश के बावजूद राज्य सरकारों ने एक्ट के कुछ ही बिन्दुओं पर अमल किया....हालांमकि राज्य पुलिस कमीश्नर प्रणाली का लागू करने के लए लंबे समय से इंतज़ार में है....लेकिन आईएएस अधिकारियों का तबका ये नहीं होने देना चाहता...उस पर आए दिन  पुलिस की कारस्तानी इस मसले पर नई बहस भी छेड़ देती है....
कविता राज जी़ मीडिया



कितने कारगर पुलिस सुधार (कविता राज) 

पुलिस कार्यप्रणाली में सुधार की मांग कई बार उठी है...पिछले कुछ सालों  में दिल्ली और यूपी समेत देश के कई राज्यों में पुलिस के बर्बर रवैये और गैंगरेप जैसी आपराधिक वारदातों के बाद पुलिस प्रणाली में सुधार की वकालत फिर से होने लगी है...दिल्ली में आप की सरकार और केन्द्र सरकार के बीच पुलिस अधिकारों के मुद्दे पर खींचतान जारी है। वहीं नौकरशाही और प्रशासनिक तबके में बहस छिड़ गई है कि देश के बड़े शहरों समेत छोटे शहरों में पुलिस कार्यप्रणाली कैसी है और कैसी होनी चाहिए....उन शहरों में पुलिस की कार्यशैली कैसी है जहां पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू है..सवाल उठने लगे हैं कि पुलिस कमीश्नर सिस्टम बेहतर है या मौजूदा समय में मजिस्ट्रियल प्रणाली ज्यादा कारगर है....
अब सवाल ये है कि क्या सभी राज्यों में पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू होना चाहिए?
hdr....कहां है पुलिस कमीश्मर सिस्टम?
मौजूदा वक्त में पूरे देश में 47 पुलिस कमीश्मर है....कोलकाता में अंग्रेज़ों के ज़माने से ही ये व्यवस्था लागू है....
दक्षिण भारत के शहरों में इसे प्रमुखता से लागू किया गया है.....हरियाणा के अंबाला और फरीदाबाद में भी पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू है....जबकि बाकी जगहों पर डीजीपी और आईजी समेत एसएसपी स्तर के अफ़सर कानून व्यवस्था संभालते हैं....यूपी और बिहार जैसे बड़े राज्यों में पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू करने की मांग लंबे अरसे से हो रही है ...लेकिन यहां के आईएएस अधिकारियों का तबका इसका पुरज़ोर विरोध करता आ रहा है....2007 में बीएसपी ने इसे अपने घोषणापत्र में भी शामिल किया था लेकिन अधिकारियों के विरोध के चलते ये संभव नहीं हो पाया...
एसपी सरकार भी इस दिशा में कोई प्रयास करती नहीं दिखाई देती है ...मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां की पुलिस भी इसे अपनी पुरानी हसरत कहकर इसका समर्थन करती दिखती है..लेकिन यहां भी सरकार और नौकरशाहों के ढीले ढाले रवैये के चलते इस पर बात आगे नहीं बढ़ पाई है.....
क्यों होता है पुलिस कमीश्नर सिस्टम का विरोध ?
इस प्रणाली के अमल में आने से आईएएस अधिकारियों के अधिकार छिनने का खतरा बना रहता है...पुलिस कमीश्नर प्रणाली के तहत अधिकारियों को ज्यादा अधिकार मिल जाते हैं....जबकि मौजूदा व्यवस्था में मजिस्ट्रेट के पास सारे अधिकार होते हैं....पुलिस को अपने इलाके में शांति व्यवस्था और कानून बनाए रखने के लिए मजिस्ट्रेट के आदेश पर निर्भर रहना पड़ता है.....
क्या है पुलिस कमीश्नर सिस्टम?

पुलिस कमीश्नर सिस्टम अंग्रेज़ों के ज़माने की व्यवस्था है
जिन शहरों की आबादी 10 लाख से ज्यादा है वहां कमीश्नर की नियुक्ति की जाती है
दिल्ली में 1979 में जेएन चतुर्वेदी को पहला पुलिस कमीश्नर बनाया गया।
इस प्रणाली के तहत पुलिस के पास सीआरपीसी के तहत कई अधिकार आ जाते हैं...इसी अधिकार के तहत पुलिस को भीड़ को काबू करने के लिए उस पर लाठीचार्ज..फायरिंग .धारा 144 और आर्म्स लाइसेंस जैसी कार्यवाही की छूट मिल जाती है...
किसी होटल ..बार का लाइसेंस रद्द करने का भी अधिकार पुलिस के पास आ जाता है...
आरोपी पर जुर्माना लगाकर उसे जेल भेजने ,,,,,एनएसए यानू राष्ट्रीय सुरक्षा कानून..नारकोटिक्स..एक्साइज़ संबंधी अधिकार भी पुलिस कमीश्नर के पास होते हैं.....
दूसरी ओर मजिस्ट्रियल सिस्टम में धारा 144 ...107 और 51 की पावर डीसी के पास रहती है....
Gfx out
पुलिस कमीश्नर सिस्टम को लागू करने की वकालत करने वालों का तर्क है कि ये इसके लागू होने से पुलिस नेताओं और अफ़सरों के हाथ का खिलौना नहीं रह पाएगी....जबकि दूसरी  ओर इसका विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे पुलिस निरंकुश हो जाएगी..
क्या कहते हैं कानून के जानकार
जानकार कहते हैं कि पुलिस बल की संख्या बढ़ाने  और काम के बोझ को कम करना मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है.....पुलिस के जवानों का वेतन बढ़ाने और उन्हें आधुनिक करने की भी ज़रूरत है
जहां तक पुलिस प्रणाली में सुधार और संशोधित एक्ट को लागू करने की बात है ...तो अब तक कई राज्यों ने इश पर अमल नहीं किया है..5 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित पुलिस एक्ट को लागू करने के आदेश भी दिए थे ....
नए एक्ट के तहत सुरक्षा आयोग का गठन करना होगा
जो पुलिस को कामकाज की निगरानी करेगा और राज्य सरकार  को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा...
आयोग की रिपोर्ट मानने के लिए सरकार बाध्य होगी और उसकी मनमर्ज़ी पर लगाम लग सकेगी..
नए एक्ट में डीजीपी की नियुक्ति वरिष्ठता और सेवा रिकॉर्ड के आधार पर होनी चाहिए...और यहीं प्रक्रिया आईजी.....डीआईजी रेंज से लिए भी लागू करने की बात कही गई थी....
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पुलिस सुधार प्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट का पहला आदेश यही था कि पुलिस के कामकाज से राजनैतिक हस्तक्षेप खत्म किया जाए....कोर्ट के आदेश के बावजूद राज्य सरकारों ने एक्ट के कुछ ही बिन्दुओं पर अमल किया....हालांमकि राज्य पुलिस कमीश्नर प्रणाली का लागू करने के लए लंबे समय से इंतज़ार में है....लेकिन आईएएस अधिकारियों का तबका ये नहीं होने देना चाहता...उस पर आए दिन  पुलिस की कारस्तानी इस मसले पर नई बहस भी छेड़ देती है....
कविता राज जी़ मीडिया (2011)

बुधवार, 28 सितंबर 2016


जरूरी डॉक्यूमेंट्स खोने का अब नहीं रहेगा डर, डिजिलॉकर से कई मुश्किलें दूर

रोजमर्रा के ज्यादातर क्षेत्रों में तकनीक के बढ़ते दखल के बीच डिजिटल  दुनिया से लोगों का संपर्क बढ़ रहा है. केंद्र सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ मुहिम  के तहत ज्यादा-से-ज्यादा चीजों को इससे जोड़ रही है. इस मुहिम  के तहत  केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष ‘डिजिलॉकर’ एप्प  लॉन्च किया था, जिसका दायरा  बढ़ाते हुए इसे डीएल (ड्राइविंग लाइसेंस) और आरसी (रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट) से भी जोड़ दिया गया है. 
वैसे डाटा को ‘ऑनलाइन सेव’ करने का चलन अब आम हो  चुका है. ऐसे समय में डिजिलॉकर के रूप में एक ऐसे  एप्प का विचार धरातल पर उतरा है,  जिसकी मदद से प्रत्येक आधार कार्डधारी भारतीय अपने संबंधित दस्तावेजों को  सुरक्षित रख सकता  है. आधार कार्ड यूजर डिजिलॉकर की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से इस एप्प से जुड़ सकते हैं.  जानते है डिजिलॉकर से जुड़े कुछ  जरूरी तथ्यों के बारे में.
क्या है डिजिलॉकर
 डिजिटल लॉकर या डिजिलॉकर एक स्मार्टफोन एप्प है, जिसे भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स व इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने जारी किया है.  इस एप्प में हम अपने  जरूरी दस्तावेज- जैसे मार्क्सशीट, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, पैन कार्ड,  पासपोर्ट, एयर टिकट, मैरिज सर्टिफिकेट, बर्थ सर्टिफिकेट, ड्राइविंग  लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट आदि को अपलोड और स्टोर करके रख सकते हैं.  इस इ-फॉर्मेट डॉक्यूमेंट की वैधता फिजिकल डॉक्यूमेंट की तरह ही होती है. इस  तरह हमारे सभी जरूरी डॉक्यूमेंट इस डिजिटल लॉकर में सुरक्षित रह सकते हैं.  यह डिजिलॉकर एक जीबी की स्टोरेज सुविधा मुहैया कराता है. यह एप्प नि:शुल्क  है, जिसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है.
  कैसे अपलोड कर सकते हैं डॉक्यूमेंट्स
तकनीकी  तौर पर यह एप्प ठीक उसी तरह काम करता है, जैसे दूसरे क्लाउड स्टोरेज  सर्विस काम करते हैं. यह एप्प सीधे तौर पर सरकारी एजेंसियों और अनेक  सिक्योरिटी प्रोटोकॉल से जुड़ा हुआ है, ताकि हमारे डॉक्यूमेंट सुरक्षित रह  सकें. गूगल प्ले स्टोर से इस एप्प को डाउनलोड करने के बाद, इस पर अपना  एकाउंट क्रिएट करना होता है. 
एकाउंट क्रिएट करने से पहले यूजर को प्रमाणित  करने के लिए  यह एप्प उसका मोबाइल नंबर पूछता है और इसके बाद यह उसे ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) भेजता है. ऑथेंटिफिकेशन प्रोसेस पूरा हो  जाने के बाद यूजर को अपने एकाउंट में लॉग-इन करने के लिए यूनिक यूजरनेम और  पासवर्ड क्रिएट करना होता है. इसके बाद यूजर अपने एकाउंट के जरिये अपने  डॉक्यूमेंट्स को इस लॉकर में अपलोड और स्टोर करके रख सकते हैं. 
दो तरीकों से करता है यह काम
 यह डिजिलॉकर दो तरीके से काम करता है.

-  पहला तरीका : इसके तहत यूजर को सरकारी एजेंसी द्वारा जारी डॉक्यूमेंट को  डाउनलोड करना होता है. मान लीजिए आपने ड्राइविंग लाइसेंस के लिए आवेदन किया  है, तो आपका लाइसेंस जारी होने पर संबंधित एजेंसी से आपके डिजिलॉकर एप्प  पर एक नोटिफिकेशन आयेगा कि आप अपने लाइसेंस या पेपर को डाउनलोड कर लें.  हालांकि, इस तरह का नोटिफिकेशन उसी यूजर को आयेगा, जिसने डिजिलॉकर एकाउंट  क्रिएट करते समय अपने आधार कार्ड की जानकारी  साझा की होगी.
 -   दूसरा  तरीका : यूजर अपने सभी डॉक्यूमेंट जैसे सर्टिफिकेट, पैन कार्ड, आधार कार्ड  और ड्राइविंग लाइसेंस की हार्ड कॉपी   स्कैन करके अपने इ-सिग्नेचर के साथ  इस एप्प में अपलोड कर दें.
ईएप्प की खासियत : इस  एप्प की एक खासियत यह है कि इसमें यूजर द्वारा सेव किये गये डॉक्यूमेंट और  सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी किये गये डॉक्यूमेंट अलग-अलग सेव होते हैं.  इससे यूजर्स को डॉक्यूमेंट देखने में आसानी होती है. इसके अलावा यह यह एप्प  संबंधित सर्विस पर होनेवाले खर्चे को कम करने में भी सरकार की मदद करेगा.  जरूरत पड़ने पर इस सर्विस के जरिये यूजर्स दूसरी सरकारी एजेंसियों के साथ  अपने डॉक्यूमेंट को शेयर कर सकते हैं और उसका वेरिफिकेशन करा सकते हैं.
 राह में आसानी से जांच  
 -  यातायात कर्मी स्मार्टफोन के जरिये ड्राइविंग लाइसेंस व रजिस्ट्रेशन पेपर की आसानी से जांच कर सकेंगे. 
-  इससे इन पेपर्स के खोने का डर खत्म हो जायेगा. साथ ही घर पर छूट जाने या खो जाने की स्थिति में चालान भी नहीं देना होगा. डिजिलॉकर में प्रयुक्त होने वाले कुछ खास शब्द
इ-डॉक्यूमेंट :  इलेक्ट्रॉनिक डॉक्यूमेंट, जिसे उचित प्रारूप (एक्सएमएल व प्रिंटेड दोनों)  में एक या अधिक व्यक्तियों (आधार कार्ड धारी) को जारी किया गया हो.
रिपोजिटॉरी : इ-डॉक्यूमेंट का कलेक्शन.

इश्यूअर :  वह संस्था, जो एक मानक प्रारूप में किसी को इ-डॉक्यूमेंट जारी करती है और  उसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में उपलब्ध कराती है, जैसे सीबीएसइ, रजिस्ट्रार  ऑफिस, आयकर विभाग आदि.

रिक्वेस्टर : वह संस्था या व्यक्ति, जो स्टोर किये गये किसी खास डॉक्यूमेंट तक सुरक्षित पहुंच (सिक्योर एक्सेस) का आग्रह करता है.
यूआरआइ : यूआरआइ यानी यूनिफॉर्म रिसोर्स इंडिकेटर, किसी भी इ-डॉक्यूमेंट का एक  यूनिक लिंक होता है, जिसे इश्यूअर डिपार्टमेंट द्वारा जेनरेट किया जाता है.  डिजिटल लॉकर सिस्टम के प्रत्येक इ-डॉक्यूमेंट के लिए यूआरआइ अनिवार्य होता है. डिजिलॉकर के उपयोग संबंधी कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

- आधार कार्ड होने पर ही डिजिलॉकर को एक्सेस किया जा सकता है.

-  आधार डाटाबेस में दिये गये यानी लिंक किये गये मोबाइल नंबर और इमेल  आइडी  के जरिये ही डिजिलॉकर के लिए रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है. मोबाइल नंबर और  इमेल आइडी बदल जाने की दशा में डिजिलॉकर के लिए ‘साइन-अप’ करने से पहले  आधार डाटाबेस में इन  दोनों को बदल देना चाहिए. -  शुरू में डिजिलॉकर में क्लाउड स्टोरेज के लिए 10 एमबी स्पेस था, जिसे बढ़ा कर एक जीबी कर दिया गया है. -  डिजिलॉकर में अपलोड होनेवाली प्रत्येक फाइल का साइज एक एमबी से ज्यादा साइज की नहीं होनी चाहिए.

वित्तीय धोखाधड़ी से बचाव

मौजूदा तकनीकी युग में वित्तीय धोखाधड़ी बढ़ गयी है. ऐसे में डिजिलॉकर की मदद से  सुरक्षित तरीके से डॉक्यूमेंट को साझा किया जा सकता है. फ्रॉड से बचाव के  लिहाज से इसे अब तक सुरक्षित समझा जा रहा है.  इस एप्प की मदद से संबंधित  डॉक्यूमेंट को किसी भी समय, कहीं भी एक्सेस किया जा सकता है. इसका सबसे  बड़ा लाभ ‘इ-साइन’ है, जिसे डिजिटल सिग्नेचर के तौर पर अनेक जगह इस्तेमाल  किया जा सकेगा. इ-साइन को सभी तरह के सरकारी कार्यों के लिए ‘इ-गवर्नेंस  वैलिड साइन’ माना जाता है.

कब से आया यह अमल में

केंद्र सरकार ने जून, 2015 में डिजिलॉकर सेवा की शुरुआत की थी,  ताकि भारतीय नागरिक अपने आधिकारिक दस्तावेजों को क्लाउड में स्टोर कर  सकें. लेकिन, तब से यह सेवा  12वीं क्लास के छात्रों तक ही सीमित  थी,  जिसमें वे सीबीएससी की वेबसाइट से  अपने अंकपत्र व प्रमाणपत्र को डाउनलोड  कर उसे स्मार्टफोन में स्टोर करते थे. पिछले दिनों इस सेवा को विस्तार देते  हुए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय से जोड़ दिया गया. यह मंत्रालय अब  ड्राइविंग लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट को इस एप्प पर जारी कर सकेगा. इस तरह यह सर्विस कई जरूरी दस्तावेज को सुरक्षित रखने के लिए राष्ट्रीय डिजिटल लॉकर बन गया है. अब यदि आपके पास स्मार्टफोन है तो  बाइक या कार चलाते समय अपने साथ लाइसेंस और सर्टिफिकेट रखने  की जरूरत नहीं है. 
क्यों है इसकी जरूरत

सरकारी  एजेंसियों को  फिजिकल डॉक्यूमेंट के इस्तेमाल को कम करने और उन्हें  इ-डॉक्यूमेंट के इस्तेमाल में  सक्षम बनाने के लिए डिजिलॉकर की जरूरत है.  इस एप्प के इस्तेमाल से सरकारी  विभागों और एजेंसियों के प्रशासनिक कार्यों  का बोझ कम होगा. इससे लोगों का समय बचेगा  और कागज की भी बचत होगी. सरकारी डॉक्यूमेंट्स आसानी से प्राप्त  करने के लिए भी यह एप्प ज्यादा  जरूरी है. इससे अनावश्यक भागदौड़ से  लोगों को राहत मिलेगी. 

सोमवार, 26 सितंबर 2016

बालों को काला करने के आयुर्वेदिक टिप्स 

बालों को प्राकृतिक रूप से काला करने के लिये आयुर्वेद में उपायों का खजाना है. काले-घने और लंबे बालों का राज है बालों की जड़ों को मिलने वाला पोषण। बालों को पोषण कलर, डाई या शैंपू से नहीं बल्कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों (Ayurvedic Herbs) वाले से धोने या आयुर्वेदिक तेल (Ayurvedic Oils) लगाने से मिलता है।
आइए जानते हैं, कुछ ऐसे आयुर्वेदिक उपायों (Ayurveidc Tips or Home Remedies) के बारे में जिसे इस्तेमाल करने से बाल न सिर्फ काला होता है बल्कि उनमें कुदरती चमक भी आती है। साथ ही, बालों का झड़ना-गिरना (Hair Fall) भी बंद हो जाता है।


आंवला पाउडर (Aanvala Powder)
आंवले के पाउडर को लोहे के काले रंग के बर्तन में एक दिन तक रखिए और दूसरे दिन सुबह इसमें थोड़ा पानी मिलाकर पेस्ट बना लीजिए। इस पेस्ट को पूरे एक हफ्ते तक पानी मिला कर लोहे बर्तन में रखना है। हफ्ते भर में यह पेस्ट बिल्कुल काला हो जाएगा। जब यह पेस्ट पूरी तरह काला हो जाए तो इसे डाई की तरह बालों में लगाएं। इस विधि को दो-तीन बार अलग-अलग दिन पर आजमाए। बालों में कुदरती काला रंग आने लगेगा (white hair turn to black hair)
शिकाकाई (Shikakai)
शिकाकाई और सूखे आंवले लेकर को अच्छी तरह से कूट ले। दोनों के टुकड़ों को रात भर पानी में भिगों कर रखें। सुबह इस पानी को कपड़े के साथ मसलकर छान लें और इससे बालों की मालिश करें। मालिश करने के आधा घंटा बाद बाद नहा लें। बालों के सूखने पर नारियल का तेल लगायें। ऐसा करने से बाल काले, लंबे, मुलायम और चमकदार होते हैं। खास बात यह है कि शिकाकाई और आंवले से बाल कभी सफेद नहीं होते व जिनके बाल सफेद हों तो वे भी काले हो जाते हैं.
नारियल व जैतून का तेल और नींबू का रस (Coconut Oil, Olive Oil and Lemon Juice)
नारियल के तेल और जैतून के तेल (ऑलिव ऑयल) की बराबर मात्रा लेकर इसमें नींबू की कुछ बूंदे मिला कर बालों की मालिश करें। मालिश के बाद फिर गर्म तौलिए से सिर को तीन मिनट के लिए ढकें। ऐसा करने से बालों का झड़ना (hair fall) बंद होता है और बाल काला भी होता है।
मेथी पाउडर (Methi Powder)
मेथी के बीजों में बालों को पोषण देने वाले सभी जरुरी तत्व मौजूद होते हैं। मेथी के बीज में फॉस्फेट, लेसिथिन, न्यूक्लिओ-अलब्यूमिन और कॉड-लिवर ऑयल के साथ फोलिक एसिड, मैग्नीशियम, सोडियम, जिंक, कॉपर, नियासिन, थियामिन, कैरोटीन आदि पोषक तत्व पाए जाते हैं जो बालों की जड़ों को मजबूती प्रदान करते हैं।
मेथी दानों को ग्राईंडर में पीसकर चूर्ण बना लें। चूर्ण में पानी मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें और इस पेस्ट को बालों में लगाएं। इसे लगाने से बाल काला, घना और लंबा तो होगा ही, डैंड्रफ की परेशानी भी खत्म होगी।
अमरबेल (Amarbel)
करीब 250 ग्राम अमरबेल को लगभग तीन लीटर पानी में उबालें। जब पानी आधा हो जाए और अमरबेल पानी में पूरी तरह मिल जाए तो तो इसे उतार लें। सुबह के समय इससे बालों को धोयें. इससे बाल लंबे, काले और घने होते हैं।
त्रिफला (Triphala)
त्रिफला चूर्ण में लगभग एक चौथाई ग्राम लौह भस्म मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से बालों का झड़ना बंद हो जाता है और बालों में कुदरती रंग आती है।
कलौंजी (Klaunji)
एक लीटर पानी में पचास ग्राम कलौंजी उबाल लें। इस उबले हुए पानी को ठंडाकर इससे बालों को धोएं। बाल एक महीने के अंदर काले और लंबे हो जाएंगे।
नीम (Neem)
नीम के पत्तों को पानी के साथ पीसकर बालों में लगाएं व दो-तीन घंटे के बाद बालों को धो डालें। इससे बालों का झड़ना कम होगा और बाल लंबे और काले भी होंगे।
मेंहदी और आंवला (Mehandi and Aanvala)
सूखी मेंहदी और सूखा आंवला की बराबर मात्रा लेकर शाम को पानी में भींगने के लिए छोड़ लें। रात भर भींगने के बाद सुबह इससे बालों को धोएंट इसे लगातार आजमाने बाल काले, मुलायम और लंबे होते हैं।
रीठा (Reetha)
एक ग्राम कपूर, 100 ग्राम नागरमोथा और रीठे के फल की गिरी, शिकाकाई पाव भर और 200 ग्राम आंवला, इन सभी को मिलाकर पीस लें। इस मिश्रण को आधा ग्लास पानी में मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को बालों में लगाएं लेप सूखने के बाद गुनगुने पानी से बालों को अच्छी तरह धो लें। इससे बाल काले, घने और मुलायम होते हैं। रीठा, आंवला व शिकाकाई को आपस में मिलाकर बाल धोने से बाल सिल्की और चमकदार होती है।
शंखपुष्पी (Sankhpushee)
शंखपुष्पी से बने तेल रोजाना नियमित रूप से बालों में लगाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं।
भांगरा (Bhangra)
जहां पर बाल न हों, वहां पर भांगरा के पत्तों के रस से मालिश करने से कुछ ही दिनों में अच्छे काले बाल निकल सकते हैं। जिन लोगों के बाल अधिक टूटते-झड़ते हैं उन्हें इस उपाय को जरूर आजमाना चाहिए। त्रिफला चूर्ण को भांगरा के रस में उबाल कर फिर इसे अच्छी तरह से सुखाकर, पीसकर रख लें। इसे प्रतिदिन सुबह के समय लगभग 2 ग्राम तक सेवन करने से बालों का सफेद होना बंद हो जाता है।
काला तिल (Kala Til)
काले तिल के तेल बालों में लगाने से बाल सफेद नहीं होते हैं। रोजाना सिर में तिल के तेल की मालिश करने से बाल हमेशा मुलायम, काले और घने बने रहते हैं।


निवेशकों को आकर्षित कर रहे हेल्थकेयर स्टार्टअप्स


कई स्वास्थ्य संकेतकों पर आधारित एक ताजा वैश्विक अध्ययन के नतीजों में भारत को 188 देशों की सूची में 143वें पायदान पर रखा गया है. यह स्थिति देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली बयां करती है. लेकिन, इस बीच अच्छी खबर यह है कि इनोवेटिव आइडियाज पर आधारित कुछ हेल्थकेयर स्टार्टअप्स देश  में लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने में मददगार साबित हो रहे हैं और इनमें व्यापक निवेश भी हो रहा है. जानते हैं इलाज को सुगम बनाते, डॉक्टर और दवाओं तक पहुंच आसान बनाते हेल्थ सेक्टर के कुछ स्टार्टअप्स के बारे में, जिनमें हाल के महीनों में निवेश होने की खबरें आयी हैं.

हेल्थकार्ट _
यह कंज्यूमर हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स, खासकर डाइटेरी सप्लीमेंट्स और मेडिकल उपकरण   मुहैया करानेवाला एक इ-कॉमर्स पोर्टल  है. ‘टेक इन एशिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले माह सिकोइया कैपिटल और अन्य निवशकों ने  इसमें 12 मिलियन डॉलर का निवेश किया है. इनमें कुछ ऐसे भी हैं, जिनका भारत में इ-कॉमर्स स्पेस में व्यापक कारोबार फैल चुका है.

पियांटा  -
हेल्थकेयर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेषज्ञों से सलाह के लिए समय लेने और फिजिकल थेरेपी, नर्सिंग व लैब सैंपल कलेक्शन करनेवाले इस स्टार्टअप को हाल के दिनों में सीड फंडिंग के जरिये निवेश की बड़ी रकम हासिल हुई है. यह अपना होम हेल्थकेयर प्रैक्टिस मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर भी बेचता है, जो रीयल टाइम में स्टाफ को तलाशने और अन्य चीजों को मैनेज करने में मदद करता है व ग्राहक का डिजिटल रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखता है.
जॉक्टर-  
हेल्थ चेकअप के लिए डॉक्टर से समय लेने और लोंग टर्म इंटेंसिव केयर समेत क्रोनिक केयर आदि सेवाएं मुहैया करानेवाले इस स्टार्टअप में इस साल बड़ी रकम का निवेश हुआ है, जिसमें ब्रांड कैपिटल इन्क्यूबेटर की बड़ी हिस्सेदारी है. जुलाई, 2015 में स्थापित इस स्टार्टअप का कारोबार देश के अनेक बड़े शहरों तक फैल चुका है.

कर्मा हेल्थकेयर  -
यह स्टार्टअप डॉक्टरों और टेलीमेडिसिन की मदद से ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराता है. आधुनिक तकनीकों के जरिये यह ग्रामीण क्षेत्रों से मरीजों का रीयल-टाइम डाटा डॉक्टरों के पास भेज कर उनका इलाज आसान बनाता है. इस वर्ष इसे भी घरेलू निवेशकों से बड़ी रकम हासिल हुई है.

मित्रा बायोटेक  -
यह बायोटेक फर्म कैंसर के मरीजों को आधुनिक तकनीक आधारित सेवाएं और इलाज मुहैया कराता है. बायोप्सी रिपोर्ट के आधार पर यह डॉक्टरों और मरीजों को कम-से-कम समय में समुचित इलाज की सलाह देता है. सिकोइया इंडिया और सैंड्स कैपिटल वेंचर ने पिछले माह इसमें व्यापक निवेश किया है, जिससे इस फर्म को 27.4 मिलियन डॉलर की रकम हासिल हुई है.
मेड जीनोम  -
यह जीनोमिक्स आधारित डायग्नोस्टिक और रिसर्च कंपनी है, जो क्लिनिकल, जेनेटिक काउंसलिंग और जीनोमिक्स सोलुशंस जैसी सेवाएं मुहैया कराती है. ओंकोलॉजी और कार्डियोलॉजी जैसी बीमारियों के क्लिनीकल जेनेटिक टेस्टिंग के लिए यह डीएनए सिक्वेंसिंग का इस्तेमाल करती है, जो डॉक्टरों को यह निर्धारित करने में मदद करता है कि ये दवाएं कैसी प्रतिक्रिया करती हैं. सिकोइया इंडिया, इमर्ज वेंचर ने इसमें अच्छा निवेश किया है.

हेल्थकेयर सेक्टर के स्टार्टअप्स में निवेश-
397.41 मिलियन डॉलर का कुल निवेश हुआ है इस वर्ष भारतीय हेल्थकेयर सेक्टर में 88 फंडिंग डील्स के जरिये.

113.45 मिलियन डॉलर का निवेश हुआ है भारतीय हेल्थकेयर सेक्टर के स्टार्टअप में, 73 डील्स के माध्यम से.  

5,657 मिलियन डॉलर की कुल रकम हासिल हुई इस सेक्टर को वर्ष 2012 से अब तक, 558 फंडिंग डील्स के जरिये.

735 मिलियन डॉलर का निवेश हो चुका है हेल्थकेयर सेक्टर के स्टार्टअप में वर्ष 2012 से अब तक, 336 फंडिंग डील्स के माध्यम से. (स्रोत : वीसीसीएज)

कामयाबी की राह-
समान आइडिया के साथ शुरू हुए दो स्टार्टअप में से एक सफल हुआ और दूसरा डूब गया. आपको ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे, जहां उस आइडिया ने एक उद्यमी को तो अरबपति बना दिया, लेकिन दूसरी ओर किसी अन्य को कुछ भी कमाई नहीं हुई. उदाहरण के तौर पर यूट्यूब से भी पहले 1997 में पहली वीडियाे शेयरिंग वेबसाइट शुरू हुई, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी. जबकि उसके बाद यूट्यूब और ऐसी कई ऐसी वेबसाइट कामयाब हो चुकी हैं. समान आइडिया पर काम करते हुए कुछ उद्यम आगे बढ़ जाते हैं, जबकि कुछ पिछड़ जाते हैं. विशेषज्ञों ने इसके निम्न संभावित कारण गिनाये हैं :

1. सटीक समय पर शुरुआत : किसी कारोबार को कामयाब बनाने में इसका सर्वाधिक योगदान माना जाता है. उदाहरण के तौर पर ओला और उबर ने ऐसे समय में बाजार में दस्तक दी, जब इस आइडिया पर आधारित पूरा मैदान खाली था. लिहाजा ग्राहकों और ड्राइवरों समेत कैब मालिकों को अपने साथ जोड़ने में ये सफल रहे.

2. आइडिया का कार्यान्वयन : हालांकि, किसी उद्यम को सफल बनाने में आइडिया को सबसे बड़ी भूूमिका में समझा जाता है, लेकिन उसका कार्यान्वयन कैसे किया गया है, यह उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है. जैसे गूगल ने बाजार की जरूरतों के अनुरूप अपने आइडिया को कार्यान्वित किया और दुनियाभर में फैल चुका है.

3. ग्राहकों की जरूरत : बदलते समय के साथ ग्राहकों की जरूरतों में बदलाव होता रहता है. इसलिए बदल रहे समय और उसके अनुरूप ग्राहकों की जरूरतों को पूरा करने के बेहतर विकल्पों के बारे में आपको लगातार सोचते रहना होगा. अन्यथा कोई अन्य उद्यमी ग्राहकों की नब्ज पकड़ कर नये कंसेप्ट के साथ नया कारोबार शुरू कर सकता है और आपके ग्राहक उस ओर मुड़ सकते हैं.

4. बिजनेस मॉडल : आपके स्टार्टअप का बिजनेस मॉडल तय होना चाहिए और आपको इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि किस तरह के ग्राहकों से आपकी आमदनी आयेगी. शुरुआत में इसके लिए आपको एक सीमित दायरा लेकर चलना होगा.


टैक्स छूट लेने के लिए यहां से लें प्रमाण पत्र

पहले से ही अस्तित्व वाले किसी कारोबार के विभाजन या उसके पुनर्निर्माण के माध्यम से बनायी गयी किसी संस्था को ‘स्टार्टअप’ नहीं माना जायेगा. इस परिभाषा के मुताबिक पहचान किये गये किसी ‘स्टार्टअप’ को टैक्स छूट का लाभ हासिल करने के लिए अंतर-मंत्रालीय प्रमाणन बोर्ड से पात्र व्यवसाय का प्रमाण पत्र प्राप्त करना होगा, जिसमें निम्न शामिल हैं :

(क) संयुक्त सचिव, औद्योगिक नीति एवं

संवर्धन विभाग,

(ख) विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रतिनिधि और

(ग) जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के प्रतिनिधि.


शनिवार, 24 सितंबर 2016

 DO YOU KNOW? 
परमाणु विस्फोट कितने देश कर चुके हैं?

सबसे पहला परमाणु परीक्षण अमेरिका ने 16 जुलाई 1945 को किया था. तब से 1992 तक अमेरिका 1032 परमाणु परीक्षण कर चुका है. सोवियत संघ में 727 परीक्षण हुए, लेकिन 1992 में उसके विघटन के बाद से कोई परीक्षण नहीं हुआ. ब्रिटेन ने 88 परीक्षण किए और अंतिम परीक्षण 1991 में किया गया. फ़्रांस 217 परीक्षण कर चुका है, चीन 47, भारत छह, पाकिस्तान छह और उत्तर कोरिया ने चार परीक्षण किए हैं. इसके अलावा यह माना जाता है कि जापान, इसराइल, दक्षिण अफ़्रीका और जर्मनी ने भी परमाणु परीक्षण किए हैं.

अमेरिका का नाम कैसे पड़ा?

अमेरिकी महाद्वीप की खोज क्रिस्टोफर कोलम्बस ने 1492 में की थी, पर इसका नाम रखने में उनकी कोई भूमिका नहीं है. कोलम्बस तो समझते थे कि उन्होंने जिस जमीन को खोजा है, वह भारत है. अमेरिका का नाम इतालवी यात्री अमेरिगो वेसपुच्ची के नाम पर पड़ा है. अमेरिगो वेसपुच्ची भी कोलम्बस का दोस्त था. वह व्यापारी था और कोलम्बस की यात्रा के सात साल बाद 1499 में वह चार पोतों के एक यात्री दल के साथ अटलांटिक पार करके दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट पर पहुँचा. कुछ साल बाद जब वह वापस आया तो उसने अपनी यात्रा के बारे में लिखा. इन नई जगह को उसने नाम दिया ‘नोवस मुंडस’ यानी नई दुनिया. उसने यह साबित किया कि जिस इलाके की यात्रा करके वह आया है, वह भारत नहीं है. उसकी यात्रा का वृत्तांत 1502 में प्रकाशित हुआ.

सन 1507 में जर्मन कार्टोग्राफर (नक्शानबीस) मार्टिन वॉल्डसीम्यूलर और उनके सहयोगी मठायस रिंगमान भूगोल पर टोलमी के ग्रंथ का पुनर्प्रकाशन कर रहे थे. इसमें उन्होंने दुनिया का नया नक्शा पेश किया, जिसमें इस ‘नई दुनिया’ को दिखाया, जिसका नाम उन्होंने लिखा अमेरिका. यह नाम अमेरिगो के नाम से प्रेरित था. शुरू में उनके नक्शे में दक्षिण अमेरिका ही था. बाद में उत्तरी अमेरिका भी इसमें शामिल किया गया. प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता जेराल्ड मर्केटर ने 1958 में दोनों भूखंडों को एक नाम अमेरिका कहा.

यह भी कहा जाता है कि यह नाम ब्रिस्टल के व्यापारी रिचर्ड अमेरिके के नाम पर है. कहा जाता है कि ब्रिस्टल के व्यापारियों ने इस महाद्वीप की खोज कोलम्बस को पहले कर ली थी और उन्होंने अपने प्रायोजक के नाम पर इसका नाम रखा. पर आमतौर पर अमेरिगो वेसपुच्ची वाली बात पर ही भरोसा किया जाता है.

ई-बुक्स क्या हैं?

ई-बुक्स (इलेक्ट्रॉनिक पुस्तक) का अर्थ है डिजिटल रुप में पुस्तक. ई-पुस्तकें और पत्रिकाएं कागज पर छपी होने के बजाय डिजिटल फाइल के रुप में होती हैं. इन्हें पढ़ने के लिए ई-बुक रीडर्स या ई-बुक डिवाइसेज़ भी उपलब्ध हैं. इन्हें कम्प्यूटर, मोबाइल एवं अन्य डिजिटल यंत्रों पर भी पढ़ा जा सकता है. इन्हें इन्टरनेट पर भी छापा, बांटा या पढ़ा जा सकता है. इंटरनेट के मार्फत ई-बुक्स पढ़ने की सुविधा देने वाली व्यवस्थाओं में 1971 से चल रहा प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग सबसे अग्रणी है. ये पुस्तकें कई फाइल फॉर्मेट में होती हैं जिनमें पीडीऍफ (पोर्टेबल डॉक्यूमेण्ट फॉर्मेट), ऍक्सपीऍस आदि शामिल हैं, इनमें पीडीऍफ सर्वाधिक प्रचलित फॉर्मेट है. धीरे-धीरे पारंपरिक किताबों और पुस्तकालयों के स्थान पर पुस्तकों के नए रूप जैसे ऑडियो पुस्तकें, मोबाइल टेलीफोन पुस्तकें, ई-पुस्तकें आदि उपलब्ध हों रही हैं.

ई-पुस्तकों को पढ़ने के लिए उपकरण अलग से भी उपलब्ध हैं. इनमें अमेजन.कॉम का किण्डल तथा ऐपल का आईपैड शामिल है. पाइ एक अन्य उपकरण है. नई-पुरानी किताबों सहित कई तरह की सामग्री इसमें ऑनलाइन स्टोर कर सकते हैं. मोबाइल के लिए एडोबी रीडर लाइट उपलब्ध है.

मीडियम वेव और शॉर्ट वेव रेडियो तरंगे क्या होती हैं?
रेडियो तरंगें एक प्रकार का इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक रेडिएशन है. ये तरंगें पूरे ब्रह्मांड की यात्रा करती हैं. आप जिन रेडियो तरंगों की बात कर रहे हैं वे कृत्रिम रूप से तैयार की गई तरंगें हैं. इनका इस्तेमाल रेडियो-टीवी प्रसारण, मोबाइल फोन, नेवीगेशन, उपग्रह संचार, कम्प्यूटर नेटवर्क, सर्जरी और अन्य चिकित्सा से लेकर माइक्रोवेव अवन तक में होता है. इन तरंगों को कई तरह की फ्रीक्वेंसी में इस्तेमाल किया जाता है. मीडियम वेव आमतौर पर 526.5 से 1606.5 किलोहर्ट्ज़ की फ्रीक्वेंसी में होती हैं. ये तरंगें धरती की गोलाई के साथ घूम जाती हैं और अयन मंडल से गुज़र सकती हैं. इस लिहाज़ से ये स्थानीय से लेकर एक महाद्वीपीय प्रसारण तक के लिए उपयोगी हैं. शॉर्ट वेव इनसे काफी ऊँची फ्रीक्वेंसी पर काम करती हैं. 3000 से 30000 किलोहर्ट्ज़ तक. मीडियम वेव के मुकाबले ये काफी लम्बी दूरी तक प्रसारण में उपयोगी हैं. लांग वेव प्रसारण भी सम्भव है. अमेरिका और यूरोप में होता भी है. मोटे तौर पर 535 किलोहर्ट्ज़ से नीची फ्रीक्वेंसी प्रसारण को लांग वेव प्रसारण कहते हैं. कई देशों की नौसेनाएं पनडुब्बियों से सम्पर्क के लिए 50 किलोहर्ट्ज़ से नीचे की फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करती हैं.


तलाक से आगे जहां और भी है

 

नासिरुद्दीन
वरिष्ठ पत्रकार

(नोट : मुमकिन हो तो इसे एक स्त्री की बात मान कर पढ़ें.)  


मैं भारतीय हूं. मैं मुसलमान हूं. मैं भारतीय मुसलमान स्त्री हूं. पिछले कुछ महीनों से मेरी जिंदगी के बारे में खूब बात हो रही है. मेरे जेहन में भी कई सवाल उठते रहे हैं. बात, जिंदगी के बारे में होती और बहस की सुई तलाक-तलाक-तलाक और निजी कानून पर जाकर अटक जाती है. क्या मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मसला यही है? मेरी जिंदगी, शादी के पहले भी है, शादी के बाद भी और शादी के बिना भी. तलाक के बाद भी रहेगी. तो फिर मेरी इन जिंदगियों के मसलों के बारे में भी खुल कर क्यों बात नहीं की जाती है?

मैं इस मुल्क की शहरी हूं. यानी इस मुल्क का संविधान मेरे लिए भी है. वह जिन हकों की बात करता है, वह मेरे लिए भी होंगे. हां, मैं मुसलमान हूं, संविधान इस नाते भी मेरा कुछ ख्याल रखता होगा. मगर मैं स्त्री भी हूं- संविधान इस बिना पर मेरे साथ गैर-बराबरी की भी तो बात नहीं ही करता है. है न!

भारत में मुसलमानों की कुल आबादी करीब सवा 17 करोड़ है. यानी देश में 14.2 फीसदी मुसलमान हैं. आम समझ तो यही कहती है कि कुदरत के मुताबिक इसमें आधे पुरुष होंगे और आधी स्त्रियां होंगी. तभी तो हमें आधी आबादी कहते हैं. लेकिन, हम पुरुषों से ढाई फीसदी कम हैं! ढाई फीसदी का मतलब है कि 43 लाख 2 हजार 732 मुसलमान स्त्रियां, मुसलमान पुरुषों के मुकाबले कम हैं.

एक और नंबर देखिए. छह साल तक के मुसलमान बच्चे-बच्चियों की कुल आबादी में से लगभग तीन फीसदी लड़कियां यानी आठ लाख 30 हजार लड़कियां एक दशक में कम हो गयी हैं. पूरे मुल्क में छह साल तक की उम्र के प्रति हजार मुसलमान लड़कों के मुकाबले 943 लड़कियां हैं. 2001 में यह तादाद 950 थी. यानी हम लड़कियां घट रही हैं. यह तादाद अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है. मसलन, जम्मू-कश्मीर में 871, तो उत्तर प्रदेश में 933 है.

अगर कुदरत की वजह से लड़कियां कम नहीं हैं, तो हम बेटियां कहां गायब हो गयीं? मतलब साफ है, हम मुसलमान बेटियां अपने घरों में अनचाही हैं. संविधान कहता है, मेरे साथ सिर्फ इसलिए फर्क नहीं किया जायेगा, क्योंकि मैं स्त्री हूं. तो फिर इस फर्क पर शोर क्यों नहीं मचता? आखिर हम बेटियों का वजूद खतरे में पड़ने से हमारा मजहब खतरे में क्यों नहीं पड़ता?

अगर हम जी गयीं, न चाहते हुए भी बड़ी हो गयीं, तो हमारा भी मन करता है कि हम पढ़े-लिखें. लेकिन, हमें तो पढ़ने भी नहीं दिया जाता. वैसे ही मुसलमानों में साक्षर लोगों की तादाद सबसे कम (68.5 फीसदी) है. साक्षर यानी जो नाम लिख लेते हैं. लेकिन, यहां भी पुरुष हमसे आगे हैं.

देशभर में मुसलमान पुरुषों  की 75 फीसदी आबादी साक्षर है, तो हमारी तादाद सिर्फ 62 फीसदी है. 13 फीसदी का फर्क क्यों है? हम लड़कियां बिहार में 48.4 फीसदी, झारखंड में 56.4 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 50.5 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 64.8 फीसदी ही साक्षर हैं. यानी पूरे देश में जो मुसलमान लड़कियां पढ़-लिख नहीं सकतीं, उनकी तादाद लगभग चार करोड़ चालीस लाख है. पूरे मुल्क में हम सिर्फ साढ़े दस फीसदी मुसलमान लड़कियां ही मैट्रिक कर पायी हैं. सिर्फ साढ़े सात फीसदी ही इंटर हैं और ग्रेजुएट महज चार फीसदी. जरा सोचिए कि 21वीं सदी में हम कैसा समाजी निजाम कायम करना चाहते हैं?

हम काम करना चाहते हैं, लेकिन हमारे लिए काम कहां है. आंकड़े बता रहे हैं कि लगभग 15 फीसदी हम मुसलमान महिलाएं ही किसी न किसी तरह के काम में लगी हुई हैं. और हमारी बड़ी तादाद दिहाड़ी काम में लगी हुई है, यह बताने की जरूरत नहीं है. हम बताना चाहती हैं कि 64 लाख मुसलमान महिलाएं काम करने की ख्वाहिश रखती हैं, पर उनके पास कोई काम नहीं है. क्या यह हमारी जिंदगी का मुद्दा नहीं है?

हमारी जिंदगी पर हमारा दखल नहीं है. हम अपने फैसले खुद नहीं ले सकती हैं. इसीलिए हममें से साढ़े तीन करोड़ महिलाओं की शादी 21 साल से कम में ही कर दी गयी. आज भी ऐसी शादियां हो रही हैं. 2011 में हम में से लगभग पौने तीन लाख ऐसी मुसलमान लड़कियां शादीशुदा हैं, जिनकी उम्र 10 से 14 साल के बीच है. कानूनी रूप से ऐसा करना जुर्म है. फिर भी यह जुर्म हमारे साथ हो रहा है. 2011 में 21 लाख से ज्यादा हम मुसलमान स्त्रियां तलाकशुदा की जिंदगी गुजार रही हैं. इनमें 14 साल की तलाकशुदा लड़कियां भी हैं.

वैसे तो हर लड़की के लिए सुरक्षा एक अहम मुद्दा है. मगर, हम मुसलमान लड़कियों के बारे में जरा अलग से गौर करना जरूरी है. दंगे-फसाद हमारी जिंदगी के साथ चस्पां हो गये हैं.

दंगों में हमारे साथ यौन हिंसा आम है. हमारे आने-जाने पर पाबंदी लगा दी जाती है. हमारी पढ़ाई छुड़वा दी जाती है. कम उम्र में शादी कर दी जाती है. हमें हमेशा शक की निगाह से देखा जाता है. जब न तब, पुलिस हमारे घर के मर्दों को पकड़ कर ले जाती है. बाप-भाई-पति-बेटा अगर मारा गया या पकड़ा गया, तो उसके असर को भी हम महिलाओं को ही सबसे ज्यादा झेलना पड़ता है. कहीं कुछ होता है, तो हम खौफ में जीते हैं. मगर संविधान ने तो हर नागरिक को बेखौफ जिंदगी जीने की गारंटी दी है, फिर यह खौफ क्यों है?

हमने सुना है कि सच्चर आयोग ने मुसलमानों के हालात को बेहतर बनाने के लिए कई सिफारिशें की हैं. सुना है, वे लागू भी हो रही हैं. मगर, ज्यादातर मुसलमानों और खासतौर पर मुसलिम महिलाओं की जिंदगी में तो बहुत बदलाव दिख नहीं रहा है.

हमारा मसला सिर्फ निजी कानून नहीं है. हम बराबरी और इंसाफ पर आधारित नागरिक होने का हक चाहते हैं.

शादी और तलाक के पीछे-आगे भी जहां है. हम उस जहां का लुत्फ लेना चाहते हैं. हम भी इंसान हैं. हमारे पास अक्ल और हुनर है. हमें बराबरी से जीने का मौका, बराबरी से पढ़ने का मौका, बराबरी से बेखौफ अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लेने का मौका चाहिए. शायद संविधान और इसलाम दोनों की रूह यही है. इस रूह को बरकरार रखने के लिए भी हंगामा बरपा क्यों नहीं होता?

(सभी आंकड़े 2011 की जनगणना से हैं.) --प्रभात खबर में प्रकाशित
भारत में गर्भपात कानून में संशोधन को लेकर मांग लंबे समय से उठती रही है। पिछले साल मानसून सत्र में सरकार इसके लिए प्रस्ताव भी संसद में रखना चाहती थी, मगर ऐसा हो न सका। हालांकि इस मामले में दुनि या के ज्या दातर देशों की स्थिति भारत जैसी ही है। सिर्फ 7 ही देश हैं, जहां 20 हफ्तेबाद भी महि ला को गर्भपात की इजाजत है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गर्भपात के नियमों को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी है । याचिका में महाराष्ट्र की एक 26 वर्षीय कथित बलात्कार पीड़िता ने चिकित्सकीय गर्भपात कानून-1971 की धारा 3 (2) (बी) को निष्प्रभावी किए जाने की मांग की है। इसलिए कि वह 24 हफ्ते की गर्भावस्था के बावजूद गर्भपात करवा सके। मगर हकीकत तो यह है कि वर्तमान में दुनिया में सिर्फ सात ही देश हैं, जहां मामूली कारणों के चलते 20 सप्ताह की गर्भावस्था के बाद गर्भ समाप्ति कानून का उल्लंघन नहीं है। ये देश अमेरिका, चीन, उत्तर कोरिया, वियतनाम, सिंगापुर, कनाडा तथा नीदरलैंड्स हैं।

7 देशों में 20 हफ्ते बाद भी करा सकते हैं अबॉर्शन
भारत में ये है वर्तमान कानून
वर्तमान में चिकित्सकीय गर्भपात कानून सिर्फ 20 हफ्ते तक के गर्भ की समाप्ति की इजाजत देता है। वह भी कुछ खास परिस्थिति यों में। 1971 में संसद द्वारा यह कानून अवैध गर्भपात और मातृ मृत्यु दर को कम करने के उद्देश्य से पारित कि या गया था। यह 1 अप्रैल 1972 से लागू हुआ। हालांकि 1975 और 2002 में इसमें संशोधन भी कि ए गए। इस कानून में प्रावधान हैं कि 12 सप्ता ह से कम की गर्भावस्था की समाप्ति एक डॉक्टर की सलाह से की जा सकती है। वहीं गर्भावस्था इसके ज्यादा, लेकिन 20 सप्ताह से कम है तो दो डॉक्टरों से सलाह लेना जरूरी है। हालांकि पिछले साल कानून में सुधार को लेकर एक प्रस्ताव तैयार भी हो गया था, लेकिन पास न हो सका। बताया जा रहा है कि चिकित्सा सेवा से जुड़े लोगों और विशेषज्ञों के विरोध के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय इसे मानसून सत्र में पेश नहीं कर पाया था।
कानून से सहमत नहीं 70 फीसदी महिलाएं
भारत के 20 सप्ताह वाले वर्तमान कानून से हर 10 में से 7 महि लाएं सहमत नहीं हैं। यह जानकारी फ्रांस की एक कंपनी द्वारा करवाए गए ऑनलाइन शोध में सामने आई है। इसमें 70 फी सदी ने कहा कि महि ला जब चाहे उसे गर्भपात की इजाजत होनी चाहि ए। हालांकि 30 फी सदी इसके खि लाफ हैं। यह अध्ययन 23 देशों में ऑनलाइन किया गया। इसका मकसद इस मुद्दे पर वैश्वि क राय जानना था। सर्वेक्षण में शामि ल देशों के औसतन 74 फी सदी ने कहा कि गर्भपात की इजाजत होनी चाहिए । विश्व स्वा स्थ्य संगठन और गुटमाकर इंस्टी ट्यूट के अनुसार दुनियाभर में गर्भधारण करने वाली महि लाओं में से हर चौथी को गर्भपात का सामना करना पड़ रहा है। जहां 1990 से 1994 के दौरान हर साल औसतन 5 करोड़ गर्भपात हुए, वहीं 2010 से 2014 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 5.6 करोड़ हो गया। यानी ऐसे मामलों में 12 फी सदी तक का इजाफा है। वर्तमान में सालाना 5 करोड़ 60 लाख गर्भपात का निर्ण य सोच-समझ कर लिया जा रहा है। कई अमीर देशों में इस स्थिति में सुधार है, लेकि न गरीब देशों में बदलाव नहीं आया है। शोध में यह भी पाया गया कि जिन देशों में गर्भपात कानूनी है, वहां भी गर्भपात की दर उन देशों के समान ही थी , जहां ये गैरकानूनी है।
12 फीसदी बढ़े मामले
इससे पहले यह थी व्यवस्था
1971 से पहले भारत में गर्भपात कानून ब्रिटेन के कानूनों से प्रेरित था। इसलि ए कि 1860 से लागू हुई भारतीय दंड संहि ता तत्कालीन ब्रिटिश कानून के आधार पर ही लिखी गई थी । इसमें अगर महिला को जान का जोखिम न हो तो किसी भी हाल में गर्भपात कानूनन अपराध माना गया था। इसके तहत गर्भपात करवाने वाली महिला को सात साल कारावास अथवा जुर्माना या दोनों तरह की सजा साथ देने का प्रावधान था । वहीं गर्भपात करवाने वाले डॉक्टर को तीन साल तक की सजा दी जा सकती थी ।
दी गई छूट
.......जब महिला की जान को खतरा हो या उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को किसी प्रकार का जोखिम हो।
.........विभिन्न प्रकार की जांच में बच्चे में विकलांगता के लक्षण सामने आएं या किसी प्रकार की विकृति हो।
......युवती बलात्कार का शिकार हो जाने के कारण गर्भवती हुई हो।
........18 साल से कम आयु की अवि वाहित लड़की या विक्षिप्त महिला के मामले में परिजन की
रजामंदी से गर्भपात वैध है।
------उन मामलों में भी गर्भपात को कानूनी मान्यता दी गई है, जब परिवार नियोजन का उपाय नाकाम होने से महिला गर्भवती हो गई हो।


198 देशों की यह स्थिति
इनमें से 59 देशों में महिलाओं को एक तय समयावधि तक बेरोक-टोक गर्भपात का अधिकार है।
09 देशों में गर्भावस्था का 12वां सप्ताह शुरू होने से पहले ऐसा कि या जा सकता है।
36 देश ऐसे हैं जहां 12वें हफ्ते के अंत तक महिला को गर्भपात की छूट है।
06 देश ऐसे हैं जहां 20वें सप्ताह तक बिना किसी कानूनी अड़चन के महिलाएं गर्भ समाप्त करवा सकती हैं।
07 देशों ने इस समयावधि को 20 सप्ताह से आगे बढ़ा रखा है या फिर समय सीमा की बाध्यता ही नहीं रखी।
01 देश (ऑस्ट्रेलि या) में प्रांतों को अपने तरह से गर्भपात की समयावधि तय करने के लिए कहा गया है।

इनमें तय समयावधि में भी कई तरह के प्रतिबंध
59 के अलावा शेष रह गए 133 देशों (जि नमें भारत भी शामि ल है) में गर्भपात को लेकर कुछ तरह की शर्तें लागू हैं। जैसे कि महिला की जान को खतरा या सामाजिक- आर्थि क तथा स्वास्थ्य कारण होने की स्थिति में ही गर्भपात की अनुमति देना।
इन 6 देशों में तो हर हाल में अमान्य
दुनिया के छह देश ऐसे भी हैं, जहां किसी हाल में गर्भपात मान्य नहीं है, चाहे गर्भ संबंधी जटि लताओं के कराण महिला की जान क्यों न चली जाए। इनमें लैटिन अमेरिका के चार देश (चिली, डोमिनिकन गणराज्य, अल सल्वा डोर तथा नि कारागुआ) वहीं यूरोप के दो देश (वेटिकन सिटी और माल्टा ) शामिल हैं।

रविवार, 31 जुलाई 2016

अबॉर्शन लॉ

भारत में गर्भपात कानून में संशोधन को लेकर मांग लंबे समय से उठती रही है। पिछले साल मानसून सत्र में सरकार इसके लि ए प्रस्ताव भी संसद में रखना चाहती थी, मगर ऐसा हो न सका। हालांकि इस मामले में दुनि या के ज्या दातर देशों की स्थिति भारत जैसी ही है। सिर्फ 7 ही देश हैं, जहां 20 हफ्तेबाद भी महि ला को गर्भपात की इजाजत है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गर्भपात के नियमों को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी है । याचिका में महाराष्ट्र की एक 26 वर्षीय कथित बलात्कार पीड़िता ने चिकित्सकीय गर्भपात कानून-1971 की धारा 3 (2) (बी) को निष्प्रभावी किए जाने की मांग की है। इसलिए कि वह 24 हफ्ते की गर्भावस्था के बावजूद गर्भपात करवा सके। मगर हकीकत तो यह है कि वर्तमान में दुनिया में सिर्फ सात ही देश हैं, जहां मामूली कारणों के चलते 20 सप्ताह की गर्भावस्था के बाद गर्भ समाप्ति कानून का उल्लंघन नहीं है। ये देश अमेरिका, चीन, उत्तर कोरिया, वियतनाम, सिंगापुर, कनाडा तथा नीदरलैंड्स हैं।

7 देशों में 20 हफ्ते बाद भी करा सकते हैं अबॉर्शन
भारत में ये है वर्तमान कानून
वर्तमान में चिकित्सकीय गर्भपात कानून सिर्फ 20 हफ्ते तक के गर्भ की समाप्ति की इजाजत देता है। वह भी कुछ खास परिस्थिति यों में। 1971 में संसद द्वारा यह कानून अवैध गर्भपात और मातृ मृत्यु दर को कम करने के उद्देश्य से पारित कि या गया था। यह 1 अप्रैल 1972 से लागू हुआ। हालांकि 1975 और 2002 में इसमें संशोधन भी कि ए गए। इस कानून में प्रावधान हैं कि 12 सप्ता ह से कम की गर्भावस्था की समाप्ति एक डॉक्टर की सलाह से की जा सकती है। वहीं गर्भावस्था इसके ज्यादा, लेकिन 20 सप्ताह से कम है तो दो डॉक्टरों से सलाह लेना जरूरी है। हालांकि पिछले साल कानून में सुधार को लेकर एक प्रस्ताव तैयार भी हो गया था, लेकिन पास न हो सका। बताया जा रहा है कि चिकित्सा सेवा से जुड़े लोगों और विशेषज्ञों के विरोध के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय इसे मानसून सत्र में पेश नहीं कर पाया था।
कानून से सहमत नहीं 70 फीसदी महिलाएं
भारत के 20 सप्ताह वाले वर्तमान कानून से हर 10 में से 7 महि लाएं सहमत नहीं हैं। यह जानकारी फ्रांस की एक कंपनी द्वारा करवाए गए ऑनलाइन शोध में सामने आई है। इसमें 70 फी सदी ने कहा कि महि ला जब चाहे उसे गर्भपात की इजाजत होनी चाहि ए। हालांकि 30 फी सदी इसके खि लाफ हैं। यह अध्ययन 23 देशों में ऑनलाइन किया गया। इसका मकसद इस मुद्दे पर वैश्वि क राय जानना था। सर्वेक्षण में शामि ल देशों के औसतन 74 फी सदी ने कहा कि गर्भपात की इजाजत होनी चाहिए । विश्व स्वा स्थ्य संगठन और गुटमाकर इंस्टी ट्यूट के अनुसार दुनियाभर में गर्भधारण करने वाली महि लाओं में से हर चौथी को गर्भपात का सामना करना पड़ रहा है। जहां 1990 से 1994 के दौरान हर साल औसतन 5 करोड़ गर्भपात हुए, वहीं 2010 से 2014 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 5.6 करोड़ हो गया। यानी ऐसे मामलों में 12 फी सदी तक का इजाफा है। वर्तमान में सालाना 5 करोड़ 60 लाख गर्भपात का निर्ण य सोच-समझ कर लिया जा रहा है। कई अमीर देशों में इस स्थिति में सुधार है, लेकि न गरीब देशों में बदलाव नहीं आया है। शोध में यह भी पाया गया कि जिन देशों में गर्भपात कानूनी है, वहां भी गर्भपात की दर उन देशों के समान ही थी , जहां ये गैरकानूनी है।
12 फीसदी बढ़े मामले
इससे पहले यह थी व्यवस्था
1971 से पहले भारत में गर्भपात कानून ब्रिटेन के कानूनों से प्रेरित था। इसलि ए कि 1860 से लागू हुई भारतीय दंड संहि ता तत्कालीन ब्रिटिश कानून के आधार पर ही लिखी गई थी । इसमें अगर महिला को जान का जोखिम न हो तो किसी भी हाल में गर्भपात कानूनन अपराध माना गया था। इसके तहत गर्भपात करवाने वाली महिला को सात साल कारावास अथवा जुर्माना या दोनों तरह की सजा साथ देने का प्रावधान था । वहीं गर्भपात करवाने वाले डॉक्टर को तीन साल तक की सजा दी जा सकती थी ।
दी गई छूट
.......जब महिला की जान को खतरा हो या उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को किसी प्रकार का जोखिम हो।
.........विभिन्न प्रकार की जांच में बच्चे में विकलांगता के लक्षण सामने आएं या किसी प्रकार की विकृति हो।
......युवती बलात्कार का शिकार हो जाने के कारण गर्भवती हुई हो।
........18 साल से कम आयु की अवि वाहित लड़की या विक्षिप्त महिला के मामले में परिजन की
रजामंदी से गर्भपात वैध है।
------उन मामलों में भी गर्भपात को कानूनी मान्यता दी गई है, जब परिवार नियोजन का उपाय नाकाम होने से महिला गर्भवती हो गई हो।


198 देशों की यह स्थिति
इनमें से 59 देशों में महिलाओं को एक तय समयावधि तक बेरोक-टोक गर्भपात का अधिकार है।
09 देशों में गर्भावस्था का 12वां सप्ताह शुरू होने से पहले ऐसा कि या जा सकता है।
36 देश ऐसे हैं जहां 12वें हफ्ते के अंत तक महिला को गर्भपात की छूट है।
06 देश ऐसे हैं जहां 20वें सप्ताह तक बिना किसी कानूनी अड़चन के महिलाएं गर्भ समाप्त करवा सकती हैं।
07 देशों ने इस समयावधि को 20 सप्ताह से आगे बढ़ा रखा है या फिर समय सीमा की बाध्यता ही नहीं रखी।
01 देश (ऑस्ट्रेलि या) में प्रांतों को अपने तरह से गर्भपात की समयावधि तय करने के लिए कहा गया है।

इनमें तय समयावधि में भी कई तरह के प्रतिबंध
59 के अलावा शेष रह गए 133 देशों (जि नमें भारत भी शामि ल है) में गर्भपात को लेकर कुछ तरह की शर्तें लागू हैं। जैसे कि महिला की जान को खतरा या सामाजिक- आर्थि क तथा स्वास्थ्य कारण होने की स्थिति में ही गर्भपात की अनुमति देना।
इन 6 देशों में तो हर हाल में अमान्य
दुनिया के छह देश ऐसे भी हैं, जहां किसी हाल में गर्भपात मान्य नहीं है, चाहे गर्भ संबंधी जटि लताओं के कराण महिला की जान क्यों न चली जाए। इनमें लैटिन अमेरिका के चार देश (चिली, डोमिनिकन गणराज्य, अल सल्वा डोर तथा नि कारागुआ) वहीं यूरोप के दो देश (वेटिकन सिटी और माल्टा ) शामिल हैं।